भारतीय कारागार व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप का विश्लेष्णात्मक अध्ययन
प्रदीप शर्मा1, डाॅ. सी.एल. पटेल2
1सहायक प्राध्यापक (विधि), पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
2संकाध्यक्ष, विधि अध्ययन शाला, पं. रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर (छ.ग.)
प्रस्तावना:-
अपराधों के निवारण तथा समाज से अपराधियों की संख्या कम करने में भी कारागार महतवपूर्ण भूमिका निभाते हैं क्योंकि इनके द्वारा अपराधियों को समाज से पृथक् रखना सम्भव होता है। वर्तमान में कारागारों में कारावासियों के सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि कारावधि समाप्त होने के पश्चात् उनका समाज में पुर्नस्थापना सरलता से हो सके। आज विश्व के प्रायः सभी प्रगतिशील देश अपनी कारागार व्यवस्था में उपचारात्मक पद्धति को अधिकाधिक महत्व दे रहे हैं ताकि कारावासियों का व्यक्तित्व नष्ट न हो पाए। अपराधों के प्रति समाज का दृष्टिकोण कुछ भी क्यों न हो, परन्तु यह निर्विवाद है कि अपराधियों को कारागारों में रखे जाने के परिणामस्वरूप उनके सुधार, पुनर्वास, उपचार आदि जैसी अनेक समस्याएँ कारागार प्रशासन को प्रभावित करती हैं। आधुनिक कारागार केवल निरोध-गृह मात्र न रहकर सुधार-गृह के रूप में कार्य कर रहे हैं।1
उल्लेखनीय है कि सभी कारावासियों को एक समान दण्ड दिया जाना न तो न्यायिक दृष्टि से उचित है और न ही व्यावहारिक ही है क्योंकि अपराध की गुरूता के अनुसार अभियुक्तों की कारावधि भिन्न-भिन्न होनी चाहिए। यही कारण है कि कारावासियों को उनके अपराध की गम्भीरता और दण्ड की मात्रा के अनुसार विभिन्न वर्गो मंे वगीकृत किया जाता है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु वर्तमान कारागार व्यवस्था में कारावासियों के वर्गीकरण के अनेक तरीके अपनाए जा रहे हैं ताकि दण्ड के लक्ष्य की प्राप्ति हो सके।
कारागार की अवधारणा व व्याख्या:-
डाॅ. सेठना के अनुसार ’कारागार’ का शाब्दिक अर्थ ’पिंजरा’ होता हैं। अतः कैदियों या विचाराधीन अभियुक्तों को निरोध में रखने के स्थान को कारागार कहते है। इसे ’जेल’ ’बन्दीगृह’ या ’कारागृह’ भी कहा जाता हैं। इनमें अपराधियों को दण्ड एवं सुधार हेतु रखा जाता है।
सन् 1894 के कारागार अधिनियम के अनुसार ’’कारागार राज्य सरकार द्वारा निर्धारित वह स्थान है जहाँ बन्दियों को स्थायी या अस्थायी रूप से रखा जाता है।’’
फेयर चाइल्ड ने कारागार की परिभाषा देते हुए कहा है कि ’’यह एक ऐसी दाण्डिक संस्था है जिसका संचालन राज्य या संघीय सरकार करती है और जिसका उपयोग ऐसे प्रौढ़ अपराधियों के लिए होता है जिनकी सजा एक वर्ष से अधिक हो।’’
परन्तु फेयर चाइल्ड की उपर्युक्त परिभाषा त्रूटिपूर्ण प्रतीत होती है क्योंकि कारागार में ऐसी भी अवधि की सजा के अपराधी को रखा जाता है चाहे वह कितनी ही कम क्यों न हो। सरल शब्दों में कारागार की परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है -
’’ये राज्य अथवा केन्द्र सरकार द्वारा संचालित ऐसी दाण्डिक संस्थाएँ हैं, जिनमें दण्डित अपराधियों को दण्ड भोगने तथा सुधार हेतु रखा जाता है। इनमें उन विचाराधीन अभियुक्तों को भी रखा जाता है जिन पर मुकदमा चल रहा होता है।’’2
आधुनिक दण्ड व्यवस्था के अन्तर्गत कारागार में कारावासी का आचरण अच्छा होने पर उसके दण्ड की अवधि पूरी होने के पहले ही उसे पैरोल पर छोड़ा जा सकता है। परन्तु यदि वह कारावास (च्ंतवसम) की शर्तो का उल्लंघन करता है, तो उसे पुनः कारागार में रखा जायगा। कारावधि में कारावासी को उसके व्यक्तित्व एवं रूचि के अनुसार प्रशिक्षण भी दिया जाता है ताकि कारागृह से रिहा होने पर वह स्वयं को समाज में सरलता से पुनस्र्थापित कर सके। इस प्रकार दण्ड का अन्तिम लक्ष्य कुछ भी क्यों न हो, किन्तु यह निर्विवाद है कि कारागार व्यवस्था के द्वारा कारावासियों को अभिरक्षा एवं नियंत्रण में रखकर समाज को अपराध-रहित बनाने का प्रयत्न किया जाता है।
2. भारत में प्राचीन समय से ही एक सुनियोजित कारागार व्यवस्था के अस्तित्व के प्रमाण आदिकालीन गं्रथों में मिलते हैं। बृहस्पति ने कैदियों को बन्द कारागारों में रखे जाने पर जोर दिया था। परन्तु मनु ने इस नीति का समर्थन नहीं किया। कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध गं्रथ ’अर्थशास्त्र’ में यह उल्लेख किया है कि शासक द्वारा किले के सुदृढ़ बुर्जो का बन्दी गृहो के रूप में प्रयोग किया जाता था तथा बन्दी बनाए गए अपराधियों को लोहे के जंजीरों में जकड़ कर इन बन्दी गृहों में रखा जाता था। कौटिल्य ने अपने समय के शासकों को यह परामर्श दिया था कि बन्दी गृहों को यथासम्भव सड़क के किनारे बनाया जाए ताकि सड़क पर चलने-फिरने वाले राहगीरों को देखकर कैदी अपना एकाकीपन दूर कर सकें। प्राचीन भारत में आध्यात्मिकता को प्रधानता दी जाने के कारण उस समय बन्दीगृहों में कैदियों को पश्चाताप्, आत्मचिंतन तथा आत्मशुद्धि करने के लिए पर्याप्त अवसर देने के उद्देश्य से एकांत में रखे जाने पर बल दिया जाता था। इसीलिए उन्हें छोटी-छोटी कोठरियों में एकांत कारावास में रखा जाता था।
भारत में हिन्दू तथा मुस्लिम शासकों के शासनकाल में दण्ड का उद्देश्य प्रतिरोध (कमजमततंदबम) के सिद्धान्त पर आधारित था। अतः मृत्युदण्ड, फाँसी, अंग-विच्छेद, कोड़े मारना, दागना, भूख-प्यास से तड़पाकर मारना आदि दण्ड के सामान्य तरीके अपनाए जाते थे। मुगल शासनकाल में अपराधी को दीवार में जिन्दा चुनवा देने का दण्ड भी प्रचलित था। उन्नीसवीं शदी के के मध्य में भारत में ब्रिटिश राज्य स्थापित हो जाने के पश्चात् अंग्रेजों ने भारतीय कारागारों की दयनीय दशा में सुधार करने का प्रयत्न किया ताकि कारावासी जीवन की यातनाओं को कम किया जा सके। सम्भवतः अंग्रेजी शासकों के ये प्रयास भारतीयों की सहानुभूति प्राप्त करने की नीयत से किये गए थे।3
3. कारागार का सुधारात्मक स्वरूप
भारतीय कारागार व्यवस्था में वास्तविक सुधार का प्रारम्भ सन् 1836 से माना जाता है जब एक कारागार जाँच समिति का गठन किया गया जिसने कारावासियों से सड़कों के निर्माण-कार्य में मजदूर के रूप में कार्य लिया जाना बन्द किये जाने की अनुशंसा की। तत्पश्चात् सन् 1938 में मेकाले (डंबंनसंल) के सुझाव पर एक कारागार सुधार (श्रंपस त्मवितउे ब्वउउपजजमम) गठित की गई जिसने निम्नलिखित सुझाव दिये-
(1) एक केन्द्रीय बन्दीगृह की स्थापना की जाए जिसमें एक हजार कैदियों को रखने की व्यवस्था हो तथा केवल ऐसे कैदी ही रखे जाएँ जिनकी सजा एक वर्ष से अधिक अवधि की हो।
(2) प्रांतों के विभिन्न कारागारों पर उचित नियन्त्रण रखने हेतु प्रत्येक प्रांत में एक कारागार-निरीक्षक की नियुक्ति की जाए। तदनुसार उत्तर प्रदेश (1844), पंजाब (1952), बंगाल (1954) तथा बम्बई एवं मद्रास (1862) में कारागार निरीक्षक नियुक्त किये गये।
(3) महिला अपराधियों को पृथक रखने की व्यवस्था की जाए।4
समस्त भारत के कारागारों की उचित देखभाल के लिए सन् 1955 में एक इंस्पेक्टर जनरल आॅफ प्रिजन्स की नियुक्ति की गई जो कारावासियों की समस्याओं का निराकरण भी करता था।
सन् 1862 में द्वितीय कारागार जाँच (श्रंपस म्दुनपतल ब्वउउपजजमम) गठित हुई जिसने कारागारों में गन्दगी तथा अस्वास्थ्यकारी दशा पर गम्भीर चिन्ता व्यक्त करते हुए इसमें तत्काल सुधार किये जाने का सुझाव दिया। कारागारों में समुचित सफाई के अभाव में बीमारियाँ फैलती थीं जिसके कारण अनेक कैदियों की मृत्यु तक हो जाती थी। अतः समिति ने इनकी उचित चिकित्सा तथा भोजन और सफाई की ओर विशेष ध्यान दिये जाने की आवश्यकता अनुभव की। समिति का सुझाव था कि केन्द्रीय कारागार में पन्द्रह प्रतिशत कैदियों के लिए एकांत कारावास की व्यवस्था हो तथा केन्द्रीय और प्रान्तीय कारागारों में चिकित्सक की नियुक्ति की जाए। सन् 1866 में कारागारों की व्यवस्था हो तथा केन्द्रीय और प्रान्तीय कारागारों में चिकित्सक की नियुक्ति की जाए। सन् 1866 में कारागारों में चिकित्सक नियुक्त किये गये।5
इसके पश्चात् कारागार व्यवस्था में सुधार हेतु तृतीय, चतुर्थ एवं पंचम कारागार समितियों ने समय-समय पर सुझाव दिये जिन्हें विभिन्न चरणों में लागू किया गया।
सन् 1894 में भारत के लिए कारागार अधिनियम (च्तपेवद ।बजए 1894) पारित हुआ जो भारतीय कारागारों की एकरूपता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस अधिनियम की उल्लेखनीय बात यह थी कि इसमें कारावासियों के वर्गीकरण हेतु आवश्यक कदम उठाए गए तथा कोड़े लगाने जैसे अमानवीय दण्ड को समाप्त करके दण्ड के स्वरूप में परिवर्तन किए गए। इस अधिनियम द्वारा प्रान्तों को अपने क्षेत्र के लिए कारागार-नियम बनाने की छूट दे दी गई। यह अधिनियम आज भी लागू है, यद्यपि वर्तमान बदली हुई भारतीय परिस्थितियों में इसकी उपयोगिता के बारे में संदेह व्यक्त किया जा रहा है तथा इसे तत्काल संशोधित किये जाने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।6
बींसवी सदी के प्रारम्भिक वर्षो में बाल एवं किशोर अपराधियों की दशा में सुधार की ओर विशेष ध्यान दिया गया। घोर अपराधियों के सम्पर्क से बचाए रखने के लिए इन्हें बाल-सुधार गृहों तथा बोस्र्टलों में पृथक् रखे जाने की व्यवस्था की गई। इस हेतु सन् 1897 में बोस्र्टल तथा सुधार विद्यालय अधिनियम (ठवतेजंसे ंदक त्मवितउंजवतल ैबीववस ।बजए 1898) पारित किया गया जिसके अन्तर्गत बाल एवं किशोर अपराधियों के लिए अनेक बोस्र्टलों की स्थापना की गई। प्रत्येक कारागार के लिए अधिकतम कैदियों की संख्या निर्धारित की गई। उन दिनों कारागारों के प्रशासक बहुधा अंग्रेज अधिकारी ही हुआ करते थे। बीसवीं शदी के प्रारम्भिक दो दशकों में भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन ने जोर पकड़ा अतः कारागारों में राजनीतिक कैदियों की भरमार हुई इस हेतु राजनीतिक कैदियों को दो वर्गो में रखा गया। (1) हिंसा बन्दी तथा (2) अहिंसा बन्दी। चूँकि अधिकांश राजनीतिक बन्दी सम्भ्रात भारतीय या मध्यमवर्गीय शिक्षित व्यक्ति होते थे, इसलिए कारागारों में ही उनका संक्षिप्त विचारण किया जाता था। राजनीतिक कैदियों के लिए भोजन, चिकित्सा, मनोरंजन के साधन, सगे सम्बन्धियों से मिलना आदि सम्बन्धी विस्तृत कारागार नियम बनाए गये थे। कारागार प्रशासकों का अधिकंाश समय राजनीतिक कैदियों की व्यवस्था तथा देखभाल में व्यतीत होने के कारण इन दो दशकों में सामान्य कैदियों की स्थिति की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जा सका।
कारागार व्यवस्था अपराधियों को दण्डित किये जाने की प्रतीक है जिसमें विचारणाधीन अपराधी तथा संशयित व्यक्तियों (ेनेचमबजे) को उनके परीक्षण काल में बन्दी में रखा जाता है। चूँकि कोई भी समाज अपराध और अपराधियों के बिना नहीं हो सकता है, इसलिए प्रत्येक समाज में कारागारों का होना अनिवार्य है।
भारत तथा विश्व के अन्य देशों की कारागार-व्यवस्था के इतिहास के आधार पर वहाँ अपराधियों के प्रति समयानुसार समाज के बदलते हुए दृष्टिकोण की अनुभूति होती है। कारागार व्यवस्था में दण्ड के प्रतिरोधात्मक, प्रतिशोधात्मक, निरोधात्मक तथा सुधारात्मक सिद्धान्तों का अद्भुत सम्मिश्रण मिलता हैं। कारागार के कटु अनुभवों तथा दुःखदायी जीवन से अपराधी को अपराधकृत्य की पुनरावृत्ति न करने की चेतावनी मिलती है तथा उसके दण्ड को देखते हुए अन्य व्यक्ति भी अपराध करने से दूर रहते हैं। अपराधी को कारावास का दण्ड दिया जाने से व्यथित व्यक्ति को आत्म संतोष मिलता है तथा साथ ही अपराधी को अपने किये पर पश्चाताप करने का समुचित अवसर मिलता है, जो उसे भविष्य में सामान्य जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देता है।
4. कारागार पर वर्तमान न्यायिक दृष्टिकोण:-
मामलें के अंतिम निर्णय से पहले कारावास से लेकर अदालतें अपने विवेक का दुरूपयोग कर सकती हैं। एक ही मामलें में समान अपराध के लिए अलग-अलग अभियुक्तों के लिये भिन्न-भिन्न कारावास की अवधि हो सकती है। न्यायालयों के आदेश कभी एक समान नहीं होते हैं जिसके कारण बहुत से मामलों में अन्याय होता है। अधिकांश मामलों में साक्ष्य के अभाव में अभियुक्त छूट जाते हैं तो फिर इन्हें मुकदमें के पूर्व जेल में रखने का क्या औचित्य है ? इस तरह का कारावास सजा से पूर्व अभियुक्त को दंडित करने के समान है।
उच्चतम न्यायालय ने तिहाड़ जेल के कैदियों से सम्बन्धित मामले में यह दृष्टिकोण व्यक्त किया है कि सुनवाई से पहले ही कैद एक निश्चित अवधि तक के लिये ही होनी चाहिये और अगर अवधि समाप्त हो जाती है और सुनवाई समाप्त नहीं होती है तो अभियुक्त को रिहा कर देना चाहिये।
जेलांे में क्षमता से अधिक कैदी होना-
भारत में सभी जिलों में क्षमता से अधिक कैदी बंद है। कैदियों की भारी भीड़ के कारण जेल प्रशासन कैदियों को सुविधाएँ उपलब्ध कराने में असमर्थ है। इसी कारण से कैदी जेलों में अमानवीय जीवन व्यतीत करने के लिये मजबूर हैं। कमलेश जैन के अभिमत में ’’कैदी जीवन का एक पहलू जेलों में भारी भीड़ का होना जिस ओर सरकार एवम् न्यायपालिका द्वारा शीघ्र ध्यान देने की आवश्यकता है। प्रश्न जो उठता है, वह सीधा और सरल है-यदि सरकार के पास कैदियों को रखने की जगह नहीं है तो फिर न्यायपालिका (कैद जमानत नहीं) के सिद्धान्त पर विश्वास क्यों करती हैं ? क्या व्यवस्था, जिसके पास हिरासत में पड़े लोगोें को जीने की आधारभूत सुविधाएँ मुहैया करने की कूबत नहीं है, किसी विचाराधीन अथवा सजायाफ्ता कैदी को मर जाने के लिये जेल में रखे रहने का अधिकार रखती है ?’’7
कैदियों को जेल कार्ड उपलब्ध न कराया जाना:-
जेल नियमावली के नियम 508 के अनुसार, ’’प्रत्येक कैदी को जेल में पहुँचते ही हिस्ट्री टिकट ’’दिया जाना चाहिये जिसमे विभिन्न शीर्षो के अन्तर्गत सूचना तिथिवार अभिलिखित की जानी चाहिये। इसमें जेल के भीतर की सभी महत्वपूर्ण घटनाएँ और उससे संबंधित प्रत्येक ओदश अभिलिखित किये जाने चाहिये।
’’हिस्ट्री टिकट’’ या जेल कार्ड में कैदी के जेल में भेजे जाने की तारीख, कैदी द्वारा अर्जित अवकाश या अवकाश में कटौती, जेल में रखे जाने की अवधि, न्यायालय के आदेश, कैदी की उम्र, जेल में बंदी बनाये जाते समय उसका वजन, समय-समय पर कैदी को दी गयी चिकित्सा सुविधाओं का विवरण रहता है। परन्तु यह जेल-कार्ड कैदियों का उपलब्ध न कराये जाने के कारण कैदी को निर्धारित अवधि से अधिक जेल में रहना पड़ सकता है। जेल कार्ड न रहने की वजह से कैदी यह बता पाने में असमर्थ होता है कि उसे कब जेल भेजा गया, उसको जमानत मिली या नहीं, मुकदमें का फैसल उसके पक्ष में हुआ अथवा विपक्ष में, उसे और कितने दिन जेल में बिताने हैं।
जेलों में व्याप्त भ्रष्टाचार एवम् अपराधीकरण:-
धनी और प्रभावशाली कैदी पैसे की ताकत पर जेल में स्वर्ग भोगते हैं। उन्हें सभी सुविधाएँ इतनी सहजता से प्राप्त हो जाती हैं जैसे उनको प्राप्त करना उनका नैसर्गिक अधिकार हो। अब जेलों में सभी कुछ पैसे से प्राप्त किया जा सकता है-अच्छा भोजन, कपड़ा, सोने का स्थान, स्नानगार, टी.वी. सेट, मोबाइल फोन यहाँ तक कि चरस, गांजा, अफीम, हशीस, ब्राउन शुगर, शराब और शबाब भी। अधिकारियों द्वारा मुलाकातियों से बातचीत की अनुमति, वकालतनामा भरने इत्यादि के लिये धन की अदायगी करनी पड़ती है। कमलेश जैन के कथनानुसार बिहार के पटना की बऊर जेल में ’’एक तरफ तो कैदियों के पास सिर ढकने को यथोचित छत एवम् पाँव तले साबुत एवम् साफ फर्श नहीं था, भूख एवम् प्यास मिटाने को पर्याप्त भोजन एवम् पानी नहीं था, यथोचित शौचालय नहीं थे जहाँ वे जरूरत के वक्त शौच से निवृत्त हो सकें, चिकित्सक एवम् दवाईयाँ नहीं थीं। वहीं दूसरी ओर पटना मंडल के कमिश्नर एवम् कारागार महानिरीक्षक के द्वारा पटना बेऊर जेल में डाले गए संयुक्त छापे में चारा घोटाले में कैद तीन विधायकों के कब्जे से 3 सेल्यूलर फोन, 1 टेलीविजन सेट, शराब की बोतलें तथा 3.44 लाख रूपयें नगद पाए गये।’’8
जेल व्यवस्था का एक उद्देश्य जेलों को सुधारगृहों के रूप मंे संचालित किया जाना है परन्तु वर्तमान में जेलों का उपयोग सुधारगृहों के रूप में न होकर अपराधीकरण की प्रवृत्ति को बढ़ाने के उत्प्रेरक के रूप में हो रहा है। आज जेलों को खतरनाक अपराधियों की कृपा पर छोड़ दिया गया हैं। इन खतरनाक कैदियों की सहायता से जेल अधिकारी अन्य कैदियों पर नियंत्रण स्थापित करते हैं। बड़े अपराधियों के भय से कैदी और जेल के अन्य कर्मचारी कुछ नहीं कर पाते। इसके अतिरिक्त धन का लोभ भी इन्हें कुछ करने से रोकता है। जेलों में संगीन अपराधियों द्वारा अपने गैंग बना लिये जाते हैं और ये अपने वर्चस्व के लिये कैदियों एवम् जेल अधिकारियों तक से मार-पीट करते हैं। यह कोई नई समस्या नहीं है। यह समस्य हमें ब्रिटिश राज से विरासत में प्राप्त हुई है। ब्रिटिश काल में अपने बंदी जीवन के दौरान हुए अनुभव के कारण पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जेल व्यवस्था के संबंध में यह कहा था कि ’’यहाँ किस तरह कैदी नियंत्रित किये जाते है और सजायाफ्ता को दंडित किया जाता है। अधिकांशतः उन दोषियों को ही सहायता से नियंत्रित किया जाता था, जिन्हें अधिकारियों की सहायता के लिये दोषी-वार्डन या दोषी ओवरसियर बना दिया जाता था और वे यह काम भय से या इनाम के लालच में या विशेष छूट पाने के लिये करते थे। वेतनभोगी वार्डन कम ही थे। जेल के अन्दर यह काम अधिकांशतः दोषी-वार्डन या दोषी ओवरसियर ही करते थे।’’
5. कैदियों के मताधिकार से परहेज क्यों
वैसे तो भारत जैसे विशाल देश में होने वाले आम चुनाव अनेक विचित्रताओं से भरे होते हैं, पर अभी इसमें कुछ ऐसी विसंगतियां बाकी हैं, जिनमें सुधार की जरूरत है। जैसे, देश में कुछ ऐसे लोग भी हो सकते हैं जो चुनाव में खड़े तो हो सकते हैं, जीत जाने पर जनता के प्रतिनिधि कहला सकते हैं, लेकिन वे वोट के अधिकार से वंचित रहते हैं। यह विसंगत लगने वाली स्थिति जेलों में बंद कैदियों पर लागू होती है।
15वीं लोकसभा के सदस्यों के चुनाव के लिए जारी तैयारियों के बीच जेलों में बंद आबादी को मतदान से वंचित रखने या कहें कि विश्व के सबसे बड़े जनतांत्रिक उत्सव में सहभागी होने का मसला, अब तक कहीं भी एजंेडे पर नहीं लिया गया है। समूचे देश की विभिन्न जेलों में बंद लोगों की संख्या लाखों में हैं, पर ये लाखों लोग आज भी मतदान के हक से वंचित हैं। हालांकि उल्लेखनीय है कि हाल में पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से एक ऐसा ही प्रस्ताव निर्वाचन आयोग के पास बढ़ाया गया है, जिसमें कैदियों को मतदान करने की छूट देने की सिफारिश की गई है।
वैसे तो देश में कैदियों की दशा सुधारने के तमाम अभियान चलाए जाते हैं, उनके मानवाधिकारियों की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, उनके लिए खुली जेलें बनाने की वकालत होती है, पर उन्हें मतदान से वंचित रखा जाता है। यह कैसा विरोधाभास है कि एक तरफ संविधान की धारा-326 देश में 18 साल की उम्र से ऊपर के भारतीय नागरिकों को वोट डालने का हकदार बनाती है, तो दूसरी तरफ रिप्रेजेंटेशन आॅफ पीपल्स एक्ट 1951 के सेक्शन 62(5) के तहत कैदियों के मताधिकार पर रोक लगी हुई है।
मिसाल के तौर पर, राजनीतिक तौर पर देश के सबसे सचेत राज्य केरल की विभिन्न जेलों, उपजेलों और खुली जेलों में सात हजार से अधिक लोग बंद हैं। इनमें वे भी है, जिन पर आरोप साबित हो चुके हैं और वे भी जो अभी विचाराधीन कैदी हैं। इनमें से ज्यादातर के पास वे भी सभी आवश्यक दस्तावेज हैं, जिनके आधार पर वे वोट दे सकते हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें मतदान के अधिकार से वंचित रखा जाता है। इन्कार करते है या अगर चिकित्सा सुविधाओं और देखभाल और जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक आराम के बुनियादी तत्वों से इन्कार कर दिया जाता है, फिर भी न्यायालय के मानवीय अधिकार क्षेत्र अनुच्छेद 19.. पर आधारित कर के परिचालन हो जाएगा।9
निष्कर्ष:-
जब भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन या विधायी सुरक्षा किसी भी कैदी पूर्वाग्रह को नजरअंदाज करते हैं, न्यायालय में रिट बचाव के लिए आता है, और गलत को सही और कानून के शासन का बहाल होता है। जेल प्रणाली कैदियों के लिए कार्य करने में व्यवसायिक, शैक्षिक और काम के उपलब्ध कराने के अवसरों के लिए बनाई जाती है। तर्कसंगत भेद एक कार्यात्मक वर्गीकरण प्रणाली के बिना संवैधानिक रूप से नाजायज है। एक कार्यात्मक वर्गीकरण प्रणाली के बिना ऐसा करना नहीं हो सकता है। न्यायालय प्रशासन की आलोचना का पात्र नहीं होता है अगर यह खतरनाक कैदियों और आम कैदियों के बीच एक वर्गीकरण बनाता है। परीक्षणाधीन और दोषियों के बीच एक अंतर उचित है। सुरक्षा पर असली छूट वास्तव में एक जेल के अंदर एक पेशेवर जोखिम है। सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां का हस्तक्षेत्र गलत को सही और कानून के शासन को बहाल करने के लिए है।
जेल न्याय पवित्र वाचा का एक तरह अभियुक्त की सजा न्यायालय की शक्ति के साथ-साथ चल रहे है। चुनौतीपूर्ण स्थितियों में जेल न्याय कोर्ट के न्यायिक वारंट जारी रखने के कर्तव्य और अधिकार सुनिश्चित करने के लिए है जो एक व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता की सीमा पार करने के लिए नहीं है। जहां तक जेल अभ्यास या जेल जीवन, को तोड़ने की गारंटी के अधिकार पर आंतरिक अनुदेश के स्थानों पर कोर्ट सीधे कठोर प्रतिबंध लगाता है। हर जेल की सजा जीवन और स्वतंत्रता का एक नियंत्रित अभाव है। जेल प्रथाओं की न्यायिक नीति सजा शक्ति में निहित है। आपराधिक न्यायपालिका इस तरह उनकी सजा और यात्रा जेलों के संरक्षक के लिए आवश्यक कर्तव्य है।
क्या कैदी पार्ट तृतीय के तहत अपने संवैधानिक अधिकारों को लागू कर सकते हैं ? क्या जेल न्याय सबसे प्रतिष्ठित संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकारों के साथ सहसंबद्ध है ? कैदी के मुक्त नागरिकों के सभी अधिकार कारावास को छोड़कर बने रहते हैं। कैदी अनुच्छेद 14, 19, 21 के तहत अधिकार सीमाओं को छोड़कर उनकी सजा और आनंद में कोई औचित्य होना चाहिए। सजा का मतलब अधिकारों से वंचित करना नहीं है। और अगर कैदियों को अनुच्छेद 14, 19, 21 के अधिकार सीमाओं के अधीन करने के लिए शीर्षक है, वहाँ आराम का अभाव और एक वैध समारोह के बीच कुछ संबंध होना चाहिए। कारावास सुधारक प्रणाली, मौलिक अधिकारों की विदाई के लिए नहीं है।
प्रतिरोध, दोनों विशिष्ट और सामान्य पुनर्वास और संस्थागत सुरक्षा महत्वपूर्ण हैं। दया जहाँ भी केवल संभव है और क्रूरता जहां अनिवार्य सुधारक कारावास की नीति है। जेल नीति के इस तरह के एक वैध लक्ष्य में अग्रिम, कोर्ट का हस्तक्षेप नहीं होता। लेकिन जब एक कैदी निर्दयतापूर्वक एक तरह से प्रतिबंधित है और ऐसी कोई प्रासंगिक उद्देश्य का समर्थन करता है, प्रतिबंध अनुचित हो जाता है और असंवैधानिक परिणाम है। सामाजिक रक्षा और जेल प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण पर दंड कोड का प्रयोजन है। यदि हिंसा की लगातार डर का पूरा माहौल है, और अक्सर अपने आप में सुधार करने का अवसर की आवश्यकता है।
आज कहीं भी किसी भी कानून का उल्लंघन हो या किसी के द्वारा नियमों को तोड़ा जाये, जिसके फलस्वरूप कोई हादसा हो जाय और अपराधी गिरफ्त से बाहर हो तो आंखे मूंदकर पुलिस को बलि का बकरा बना दिया जाता है। परंतु विधि के निर्माताओं, प्रशासकों, वातानुकूलित आरामगाहों में बैठे नौकरशाहों पर न तो कोई उत्तरदायित्व का बोझ डालता है और न ही उन पर कोई आक्षेप लगता हैं। प्रशासन और फिर शासन तुरंत जांच आयोग के गठन की घोषणा करते हैं।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि कारागार व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य अपराधी का सुधार, समाज का अपराध और अपराधियों से संरक्षण तथा अपराधों की संख्या में कमी लाना है।
फूड नोट
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संदर्भ ग्रंथ सूची
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10. हर्ष चन्द्र सक्सेना:- प्रियजन एण्ड प्रियजन रिलेसन:- इन साइक्लोपीडिया आॅफ सोशल वर्क इन इण्डिया-
11. सीरिज-1, पब्लिकेशन डिवीजन-भारत सरकार नई दिल्ली-1987
12. एस. प्रकाश-हिस्ट्री आॅफ इण्डियन प्रियजन सिस्टम:- लखनऊ - 1976
13. शुक्ला दासः क्राइम एण्ड पन्शिमेंट इन एन्सियन्ट इण्डिया अभिनव, नई दिल्ली 1977
14. मो. हामिद कुरेशी, ’राजगिर’ रिवाईज्ड, आर. ए. जी. घोष. डायरेक्टर जनरल आॅफ आर्केलाॅजी, नईदिल्ली 1998
15. सत्यप्रकाश संेगर ’’क्राइम एण्ड पन्शिमेंट इन गुगल इण्डिया’’ संेटर लिग-दिल्ली 1967
16. डोनाल्ड टेफ्ट-क्रिमनालाॅजी प्रकाशित आई पी पी सी 1964
17. थ्गलिन एण्ड गिलिनि-क्रिमनालाॅजी
18. एच.ई. ब्रावेस एण्ड एन.के.टीटर्स-न्यू होरीजन इन क्रिमिनालाॅजी
19. लियोन रिडसिनोविझः द ग्रोथ आॅफ क्राइम
20. विद्याभूषण ’’प्रिजन एड मिनिस्ट्रेशन इन उत्तर प्रदेश’’ 1953
21. जी. आर. मदान’’ इण्डियन सोशियल प्राब्लम्स’’ सीरिज-1 नई दिल्ली-1981
Received on 01.11.2016 Modified on 18.11.2016
Accepted on 06.12.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 199-205